राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा देश की एकता अखण्डता के लिए सबसे बड़ा खतरा है |


कैलाश कुमार – सह संपादक (युवा प्रदेश)

शहडोल – आपको बता दे कि लाल बहादुर सिंह नेटी विंध्य प्रभारी भारत आदिवासी पार्टी मध्यप्रदेश
संघ का दावा है कि वह देश सबसे बडा देश भक्त संगठन है परन्तु जब आप उसकी विचारधारा पर नजर डालते है तो साफ नजर आता है कि उसका यह दावा पूरी तरह खोखला है वास्तविकता यह है कि पर्दे के पीछे केन्द्र में भाजपा की सत्ता आने के बाद संघ अपनी विचारधारा इस देश पर थोपने के लिए बैचेन है जिससे देश के छिन भिन्न होने का खतरा है संघ की विचारधारा के अनुसार भारत में एकात्मक शासन प्रणाली लागू होना चाहिए संघ की मान्यता है कि भारत पूरी तरह से आर्यो की धरती है इस लिये हिन्दू संस्कृति या वैदिक संस्कृति के अलावा अन्य संसकृतियो के अस्तित्व को पूरी तरह नकारता है उसकी मान्यता है कि अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमान और ईसाई इस देश मे रह तो सकते परंतु दोयम नागरिक की हैसियत से इस तरह यह स्वयं सिद्ध है कि संघ की विचारधारा देश को तोड़ने वाली हैं जोड़ने वाली नहीं है इस गंभीर संभावित खतरे के बावजूद संघ के राजनीतिक दर्शन में एकात्मक राष्ट्र की स्थापना को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है संघ के दूसरे सरसंघचालक माधवसदाशिव गोलवलकर के विचारों का संकलन बंच आफ थाटस के नाम से प्रकाशित है इस ग्रन्थ गोलवलकर ने एकात्मक राष्ट्र की जोरदार सिफारिश की है वे देश के संघात्मक ढांचे के कट्टर विरोधी हैं उनका कहना है कि संघीय ढांचे को कब्र मे गाड देना चाहिए और एकात्मक शासन प्रणाली को तुरंत लागू करना चाहिए सबसे पहले गोलवलकर संविधान की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं संघ भारत के संघीय ढांचे के विरुद्ध क्यो है उसका अंदाजा गोलवलकर की पुस्तक बंच आफ थाट के एक अध्याय जिसका शीर्षक ही एकात्मकत शासन की अनिवार्यता है इस अध्याय में एकात्मकत शासन को तुरंत लागू करने के उपाय सुझाते हुये गोलवलकर लिखते है इस लछय के दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी कदम यह होगा कि हम अपने देश के विधान से साघिक ढांचे की संपूर्ण चर्चा को सदैव के लिए समाप्त कर दे अर्थात भारत के अन्तर्गत अनेक स्वायत्त अथवा अर्ध स्वायत्त राज्यो के अस्तित्व को मिटा दे तथा एक देश एक राज्य एक विधान मंडल एक कार्य पालिका घोषत करे उसमे खण्डातमक छेतृरीय साम्प्रदायिक भाषाई अन्य प्रकार के गर्व नहीं होना चाहिए एव इन भावनाओं को हमारे एकतव के सामंजस्य को उदधवंस करने का अवकास नहीं मिलना चाहिए संविधान का पुनः परीक्षण एवं पुनर्लेखन हो जिससे कि अंग्रेजों द्वारा किया गया तथा वर्तमान नेताओं द्वारा मूढतावश ग्रहण किया हुआ कुटिल विचार कि हम अनेक अलग अलग मानव वंशो अथवा राष्ट्रीयताओ के गुट जो संयोग वश भौगोलिक एकता एव एक समान सर्व प्रधान विदेश शासन के कारण साथ साथ रह रहे है इस एकात्मकत शासन की स्थापना द्वारा प्रभावी ढंग से अप्रमाणित हो जाय इसका मतलब है कि देश आजादी के बाद विविधता की सास्कृतिक धरोहर को यह कहकर सहेजा गया कि अनेकता मे एकता है जबकि गोलवलकर का मानना है कि यह देश हिन्दू राष्ट्र है इस लिये हिन्दू संस्कृति के पहचान के अलावा कोई और संस्कृतियो की पहचान नहीं होनी चाहिए अब सवाल यह उठता है कि वर्तमान मे केन्द्र मे भाजपा की सरकार है और कयी राज्यों मे भी भाजपा की सरकार है जिसके शासन प्रशासन की कार्य शैली से प्रतीत होता है कि भाजपा सरकार गोलवलकर के विचार धारा को पुर्ण रुप से और गुप्त रुप से आगे बढाने पुरजोर प्रयास कर रहे कयोंकि भाजपा संघ की विचारधारा की पैदाइश है मेरा संघ और भाजपा के विचार धारा के बारे लिखने और बताने का आशय यह है कि जो एस सी एस टी और ओ ओबी सी और अल्पसंख्यक वर्गो के लोग निजी स्वारथ के कारण संघ और भाजपा मे जुड़े है उन सभी को समाज हित को देखते हुये संघ और भाजपा से नाता तोड़ लेना चाहिए कयोंकि संघ और भाजपा कि विघटन कारी षडयंत्रकारी नीति और विचारधारा ही हमारे संविधान को खत्म करना चाहती है और हमारे संवैधानिक हक अधिकारों को ना ही लागू करना चाहती और ना ही देना चाहती है |

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